Posted by: Bagewafa | એપ્રિલ 15, 2007

निभाना भी जानता हुं_मोहंमदअली’वफा’

फूलकी पत्तीसे कट सकता है हीरे का जिगर

मर्दे नादांके लिये कलामो नर्मो नाझुक बे असर.

  

(भर्तु हरी, अल्लामां डॉ.मोहमद ईकबाल की

 जबांसे)


जानता हुं_मोहंमदअली’वफा’

साथ मगरका निभाना भी जानताहुं
आग पानी में  लगाना भी जानता हुं

दरदे दिल से परखना भी, जानता हुं
मिर्च जखम पे छिडकना भी जानता हुं.

पाया एसा जर्फ कि बरदाश्त करुं सब
पत्तीसे गुल की कतरना भी जानता हुं.

 फरेबे नजर सुंघ लेता हुं कभी कभी
हसते लबको रुलाना भी जानता हुं.

खंजर को देख कर भी आस्तीनो में
देकर ये जां हसाना भी जानता हुं.

दीवारये नहीं तूटती फूल मलनेसे
पथ्थर को में गिराना भी जानता हुं.

रक्खे तुझे न धोके मे लबे खमोशी
लफ्जी शीशा बहाना भी जानता हुं.

जल घोंसले हमारे जाये बहार मे
सब्रसे उस्को निभाना भी जानता हुं.

खूने ईंसा नहीं जाता येअब देखा
आग से में नहाना भी जानता हुं.

खोलो हमारे लिये गमके मय खाने
जामे खुशी पिलाना भी जानता हुं.

लावा टपके’वफा’ आंखो के विरां मे
मुरव्वतसे बुझाना भी जानता हुं.

 

 (15एप्रील007)

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