Posted by: Bagewafa | મે 29, 2006

रुबाइयाते वफा

1
खंडहर से उठा लाया हुँ मैँ एक जख्म फर्सुदा,
देखा तो उसमे खून से भरी मौजुद ताज्गी थी .

बरसो हुए तो भी ये जखम खुश्काया न मुर्झया,
तेरे वो झहरीले तीरोँ मे अजब की सादगी थी.
2

चींख उठा मे जाकर कब्रस्तान मे.
बस्ती मे तो अब कोई सुनता नहीँ.

शायद मरकर खूल गया हो राझ कूछ,
जीन्दह कोइ अब मौत से डरता नहीँ.
3
ُ उठालुँ जर्फको मैँ हाथ मे और जाम बन जाये.

मुक़द्दर ऐसा मैँ पालुँ के साकी काम बन जाये.

उडे अफवाह तेरे होंथसे तीतलियोंके मानीन्द
’वफा’ मेरी बातेँ इस तरह कुछ आम बन जाये.

4तेहरीरको
है कोइ मरदे कलन्दर पढ्ले इस तेहरीरको,
लोहे मेह्फूझ पर खुदा ने जो लीखी तकदीरको.

अलफाज के शीशोँ से हक़ने त्तराशा है जीसे,
है कोइ इंसाने कामील खींचले उस तसवीरको.
5 मेरे वजूद का वाहेमा–

हम कुछ भी नहीँ फीर भी हमारे होने का है वाहेमा,
वक़्त के सांचेमे एक दिन पीस जायेगी सब दास्ताँ.

तु कया तेरी नक़्सी हक़ीक़त का तिलस्म तूट्जायेगा,
राजदार भी ये आयेना ,चुपभी रहेगा ये आयेना.
मुहम्मदअली भैडु”वफा”

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